स्वराज

Original – Democracy, by Langston Hughes  (translation and title mine)

“2002″

स्वराज नहीं मिलेगा,
आज, इस बरस,
कभी भी
डर के सुलह करने से।

मेरा भी हक़ है,
तुम्हारी तरह,
इस ज़मीन पर
जमे रहेंगे
मेरे पैर।

थक गयी हूँ सुन सुन कर
जीवन का रुख़ बदलेगा
इक नया सूरज निकलेगा
अब ये मरणोपरांत आज़ादी नहीं चलेगी
रोटी कल मिलेगी, तो गाड़ी कैसे चलेगी

आज़ादी
मूल है एक,
जो बोओगे
सो पाओगे।

मैं भी यहीं हूँ,
आज़ाद,
तुम्हारी तरह।

Leave a Reply